
प्रस्तावना
भारत में त्योहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला गणेशोत्सव और देशभर में आयोजित नवरात्रि उत्सव करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। हर वर्ष इन त्योहारों के दौरान लाखों मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और उत्सव समाप्त होने के बाद उनका विसर्जन किया जाता है। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी मूर्तियों के बढ़ते उपयोग ने पर्यावरण के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
इसी समस्या के समाधान के लिए नवी मुंबई महानगरपालिका (NMMC) ने एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू की है, जिसके तहत POP मूर्तियों को पुनर्चक्रित (Recycle) कर दोबारा उपयोग में लाने की योजना बनाई जा रही है। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि नवी मुंबई को देश के प्रमुख रीसाइक्लिंग केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
गणेशोत्सव और विशाल मूर्तियों की परंपरा

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव का इतिहास 100 वर्ष से भी अधिक पुराना है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत के बाद यह पर्व सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन गया।
आज मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे, पुणे और अन्य शहरों में हजारों सार्वजनिक मंडल विशाल गणपति प्रतिमाएं स्थापित करते हैं। कई मूर्तियों की ऊंचाई 10 फीट से लेकर 30 फीट या उससे भी अधिक होती है। इन मूर्तियों को आकर्षक बनाने के लिए POP, रासायनिक रंगों और विभिन्न सजावटी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है।
त्योहार के अंतिम दिन इन मूर्तियों का समुद्र, झील, नदी या कृत्रिम जलाशयों में विसर्जन किया जाता है। बड़े पैमाने पर होने वाले इस विसर्जन के बाद भारी मात्रा में मूर्ति अवशेष जल स्रोतों में जमा हो जाते हैं।
नवरात्रि में भी बढ़ रहा है बड़ी मूर्तियों का चलन

गणेशोत्सव की तरह नवरात्रि के दौरान भी कई स्थानों पर देवी दुर्गा, महाकाली, सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।
विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों में बड़े-बड़े पंडाल बनाए जाते हैं। नवरात्रि समाप्त होने के बाद इन प्रतिमाओं का भी विसर्जन किया जाता है।
इनमें से बड़ी संख्या POP से निर्मित होती है, जिसके कारण गणेशोत्सव की तरह नवरात्रि के बाद भी पर्यावरणीय चुनौतियां उत्पन्न होती हैं।
POP क्या है और यह समस्या क्यों बन गया?
POP यानी Plaster of Paris एक रासायनिक पदार्थ है जो जिप्सम से बनाया जाता है। मूर्तिकारों के बीच यह लोकप्रिय है क्योंकि:
- यह हल्का होता है।
- आसानी से आकार दिया जा सकता है।
- जल्दी सूख जाता है।
- कम लागत में बड़ी मूर्तियां बनाई जा सकती हैं।
लेकिन इसके कुछ गंभीर पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी हैं:
1. पानी में आसानी से नहीं घुलता
मिट्टी की मूर्तियां कुछ दिनों में पानी में घुल जाती हैं, जबकि POP महीनों या वर्षों तक जलाशयों में बना रह सकता है।
2. जल प्रदूषण बढ़ाता है
विसर्जन के बाद POP के कण पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं और जल में ऑक्सीजन का स्तर कम कर सकते हैं।
3. जलीय जीवों को नुकसान
रासायनिक रंगों और POP के अवशेषों से मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
4. तलछट की समस्या
जलाशयों के तल में POP जमा होने से जल निकासी और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
नवी मुंबई महानगरपालिका की नई पहल
इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए NMMC ने POP मूर्तियों के वैज्ञानिक प्रबंधन और पुनर्चक्रण की दिशा में कार्य शुरू किया है।
महानगरपालिका का उद्देश्य है कि विसर्जन के बाद मूर्तियों को सीधे कचरे में न भेजकर उनसे उपयोगी सामग्री तैयार की जाए।
इस योजना के तहत:
- POP मूर्तियों को अलग-अलग एकत्र किया जाएगा।
- उन्हें विशेष प्रसंस्करण इकाइयों में भेजा जाएगा।
- सामग्री को शुद्ध कर पुनः उपयोग योग्य बनाया जाएगा।
- नई मूर्तियों या अन्य उत्पादों के निर्माण में उसका उपयोग किया जाएगा।
मूर्तियों की रीसाइक्लिंग कैसे होगी?

विशेषज्ञों के अनुसार रीसाइक्लिंग प्रक्रिया कई चरणों में पूरी की जा सकती है।
चरण 1: संग्रहण
विसर्जन स्थलों से मूर्तियों के अवशेष एकत्र किए जाएंगे।
चरण 2: पृथक्करण
मूर्ति से रंग, सजावटी वस्तुएं, धातु, लकड़ी और अन्य सामग्री अलग की जाएगी।
चरण 3: प्रसंस्करण
POP सामग्री को मशीनों द्वारा पीसकर पुनः उपयोग योग्य पाउडर में बदला जाएगा।
चरण 4: पुनर्निर्माण
इस सामग्री का उपयोग नई मूर्तियां, सजावटी वस्तुएं और अन्य उत्पाद बनाने में किया जा सकेगा।
GPS तकनीक का उपयोग
नवी मुंबई प्रशासन आधुनिक तकनीक का भी उपयोग करने की योजना बना रहा है।
GPS आधारित निगरानी प्रणाली के माध्यम से:
- बड़ी मूर्तियों की आवाजाही पर नजर रखी जा सकेगी।
- विसर्जन स्थलों का बेहतर प्रबंधन होगा।
- कचरा संग्रहण प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।
- पर्यावरणीय नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों को होगा लाभ
रीसाइक्लिंग के बाद प्राप्त सामग्री का उपयोग केवल मूर्तियां बनाने तक सीमित नहीं रहेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार इससे:
- स्टडी टेबल
- शैक्षणिक सामग्री
- सजावटी उत्पाद
- निर्माण कार्यों में उपयोगी सामग्री
भी तैयार की जा सकती है।
इससे नगरपालिकाओं को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है और कचरा प्रबंधन की लागत भी कम हो सकती है।
पर्यावरण संरक्षण में बड़ी भूमिका
यदि यह परियोजना सफल होती है तो इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।
जल प्रदूषण में कमी
झीलों, नदियों और समुद्र में POP कचरा कम पहुंचेगा।
स्वच्छ विसर्जन
विसर्जन के बाद जलाशयों की सफाई आसान होगी।
प्राकृतिक संसाधनों की बचत
नई मूर्तियों के लिए कच्चे माल की मांग घटेगी।
कार्बन फुटप्रिंट में कमी
रीसाइक्लिंग के कारण उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा की बचत होगी।
देश के अन्य शहरों के लिए मॉडल
यदि नवी मुंबई का यह मॉडल सफल रहता है, तो इसे अन्य महानगरों में भी लागू किया जा सकता है।
विशेष रूप से:
- मुंबई
- पुणे
- ठाणे
- नागपुर
- कोलकाता
- हैदराबाद
- बेंगलुरु
- चेन्नई
जैसे शहर इस मॉडल से लाभ उठा सकते हैं।
इन शहरों में भी हर वर्ष लाखों मूर्तियों का विसर्जन होता है और POP कचरे की समस्या लगातार बढ़ रही है।
पर्यावरणविदों की राय
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रीसाइक्लिंग ही पर्याप्त नहीं है।
वे सुझाव देते हैं कि:
- मिट्टी की मूर्तियों को बढ़ावा दिया जाए।
- प्राकृतिक रंगों का उपयोग हो।
- कृत्रिम विसर्जन टैंक बनाए जाएं।
- जनजागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- बड़े आयोजनों में पर्यावरणीय मानकों का पालन अनिवार्य हो।
रीसाइक्लिंग और पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों का संयुक्त मॉडल सबसे प्रभावी समाधान माना जा रहा है।
जनता की भूमिका
किसी भी पर्यावरणीय पहल की सफलता नागरिकों की भागीदारी पर निर्भर करती है।
लोग निम्न कदम उठा सकते हैं:
- मिट्टी की मूर्तियां खरीदें।
- पर्यावरण-अनुकूल रंगों का उपयोग करें।
- कृत्रिम विसर्जन केंद्रों का उपयोग करें।
- प्लास्टिक सजावट से बचें।
- स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन करें।
निष्कर्ष
नवी मुंबई महानगरपालिका द्वारा POP मूर्तियों के पुनर्चक्रण की पहल भारत में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। गणेशोत्सव और नवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान उत्पन्न होने वाले लाखों टन कचरे को संसाधन में बदलने का यह प्रयास शहरी कचरा प्रबंधन की नई सोच को दर्शाता है।
जहां एक ओर विशाल गणपति और दुर्गा प्रतिमाएं हमारी सांस्कृतिक विरासत और आस्था का प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। नवी मुंबई का यह रीसाइक्लिंग मॉडल दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
यदि यह परियोजना व्यापक स्तर पर सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत के कई शहर धार्मिक उत्सवों को अधिक स्वच्छ, हरित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर सकते हैं। यह पहल केवल कचरा प्रबंधन का समाधान नहीं, बल्कि भविष्य की पर्यावरण-अनुकूल शहरी संस्कृति की एक मजबूत नींव भी साबित हो सकती है।
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